मानव भारती में शाकुंतलम्

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निर्देशक, लेखक व अभिनेता आलोक उल्फत बच्चों के बीच आएं और पिन ड्राप साइलेंस न हो, ऐसा कभी हुआ है भला। जानते हैं क्यों, यह इसलिए क्योंकि आलोक के पास बच्चों के चेहरों पर मुस्कुराहट लाने की कला है। वो गंभीर से गंभीर बात भी इतनी सहजता से पेश करते हैं कि बच्चे एकटक होकर उनको सुनते हैं, मुस्कराते हैं और जमकर ठहाका लगाते हैं, तालियां बजाते हैं और चाहते हैं कि यह सिलसिला चलता रहे, बस चलता रहे। उनकी बातें, प्रस्तुति इतनी सरल और संवाद बनाने वाली होती हैं कि बच्चे आसानी से समझ जाते हैं कि आखिर उनसे कहा क्या जा रहा है।

मानव भारती स्कूल में एक बार फिर आलोक उल्फत अपनी टीम के साथ पहुंचे। बच्चे स्कूल सभागार में उनका इंतजार कर रहे थे। आप तो जानते ही हैं कि जहां बहुत सारे बच्चे इकट्ठे हों, वहां थोड़ा बहुत शोर तो होता ही है। कुछ देर में ही आलोक को अपने बीच पाकर बच्चे शांत हो गए। मानव भारती स्कूल के बच्चे आलोक उल्फत को जानते हैं और पहचानते हैं। बच्चों ने सोचा कि आज भी उनसे बहुत सारी बातें होंगी, वो भी मुस्कराते हुए, हंसते हुए। बच्चों को बताया गया कि आज हम आपके लिए एक ऐसी प्रस्तुति लेकर आए हैं, जो आपको कुछ सिखाएगी।

महान कवि कालिदास की कालजयी रचना शाकुंतलम् की नाट्य प्रस्तुति, बच्चों के बीच। शुरू में तो लगा कि बच्चे तो आलोक उल्फत से मिलने आए हैं, उनका मन शाकुंतलम् में कैसे लगेगा। मात्र 45 मिनट में बच्चे इस महान ग्रंथ को कितना समझ पाएंगे याबिल्कुल भी नहीं समझ पाएंगे। क्या उनको शकुंतला, राजा दुष्यंत, कण्व ऋषि, दुर्वासा, विश्वामित्र व मेनका और फिर शेर के दांत गिनने वाले राजा भरत इस नाट्य प्रस्तुति के बाद भी याद रहेंगे या नहीं।

सबसे बड़ा संशय तो इस बात का था कि कलाकार प्रस्तुति के दौरान बच्चों से संवाद कैसे बनाएंगे। क्योंकि आलोक तो बच्चोंसे एकतरफा संवाद नहीं करते, वो तो उनको ज्यादा सुनते हैं। शांकुतलम् में तो गंभीरता है, प्रेम है, करुणा है, विलाप है…यहां मुस्कराने या ठहाके लगाने की गुंजाइश मुझे नजर नहीं आ रही थी। इन्हीं कुछ संशयों के साथ निगाहें मंच पर थी। हाल के प्रवेश स्थल पर खड़ा था और मन में कुछ सवाल थे, जिनके जवाब मुझे बस यहीं एक जगह खड़े होकर मिलने वाले थे।

तभी पीछे से आवाज आई…, सभी बच्चों की निगाहें सभागार के प्रवेश स्थल पर टिक गईं।मेरे मुंह से निकला, अरे यह क्या…। मैंने देखा…, एक लड़की, जो क्लाउन की वेशभूषा में है, मेरे पास से दौड़ते हुए सीधे मंच पर पहुंची। किसी कलाकार की मंच पर एंट्री का यह तरीका पसंद आया। बच्चों ने उसे देखा और पिन ड्राप साइलेंस का क्रम टूटने लगा। सभागार ठहाकों से गूंजने लगे, बच्चों की मुस्कुराहट साफ दिख रही थी।

आपको बता दें कि इस क्लाउन का नाम है मिंडी, जिसको मंच पर जीवंत किया अंकिता निकर्ड ने। वो बताती हैं कि संस्कृतमें लिखित ग्रंथ पर मंचन की स्क्रिप्ट को सेंसर बोर्ड ने पास नहीं किया है। लगताहै कि अब यह प्रस्तुति नहीं हो पाएगी। सभी बच्चों को अपनी अपनी क्लास में जाना होगा। यह सुनकर बच्चे निराश हो गए और एक बार फिर सभागार में पिन ड्राप साइलेंस। पर बच्चे तो नाटक देखने आए थे और मिंडी का अंदाज उनको पसंद आ रहा था, इसलिए एक भी बच्चा अपनी जगह से नहीं उठा। मिंडी ने फिर कहा, सभी बच्चे अपनी क्लास में जाओ, यह नाटक नहीं हो पाएगा।

फिर अचानक मिंडी ने कहा, लगता है मुझे सेंसर बोर्ड से बात करनी होगी। और फिर वह मंच के पीछे पहुंची और वहां से जोरदार बहस की आवाजें आने लगीं। कुछ ही पल में मिंडी के साथ दो और क्लाउन मंच पर नजर आने लगे, जिनके हावभाव बच्चों को बहुत पसंद आए। बच्चों ने समझ लिया था कि यहां फुल मनोरंजन होने वाला है। मुझे लगा कि बच्चों ने यह तय कर लिया था कि उनमें से कोई भी नाटक देखे बिना यहां से हिलेगा तक नहीं।

मिंडी ने वहां रखे संदूक से एक पुस्तक निकाली, जिस पर लिखा था शाकुंतलम्। तीनों क्लाउन ने अपने अभिनय से यह बताने का प्रयास किया कि जिस ग्रंथ के पात्रों को यहां जीवंत करने वाले हैं, वो बहुत महान और प्राचीन है। अरे, आपका इन दो क्लाउन से परिचय कराना ही भूल गया, इनमें से एक हैं टीनू, जिनको मंच पर जीया है सागर मौयर ने और दूसरे क्लाउन कमला का किरदार श्रीराम चौधरी ने निभाया।

इसी बीच मिंडी ने बच्चों से कहा, करतल ध्वनि…. और बच्चों की तालियों से सभागार गूंजने लगा, जिससे शांकुतलम् की प्रस्तुति पर मेरा हर संशय खारिज होने लगा,क्योंकि यहां बच्चे फुल एंज्वाय कर रहे थे। मिंडी, टीनू और कमला का हास्य, व्यंग्य जैसे जैसे मंच पर परवान चढ़ने लगा, बच्चों के हंसने, ठहाके लगाने और मुस्कुराने का सिलसिला आगे बढ़ने लगा। कलाकारों ने अभिनय से उनकी निगाहों को सिर्फ मंच पर टिका दिया।

धीरे-धीरे मंच शाकुंतलम् के पात्रों से जीवंत होने लगा। विश्वामित्र का तप और मेनका का नृत्य मंच पर दिखने लगा और फिर शाकुंतलम् का सफर आगे बढ़ते हुए शकुंतला के जन्म, कण्व ऋषि के आश्रम, ऋषि दुर्वासा के श्राप और फिर राजा दुष्यंत से प्रेम,विछोह और त्याग तक अनवरत चलता रहा, वो भी बिना किसी कठिन संवाद के। हास परिहास के बीच महान रचना शाकुंतलम् की मर्यादा और संस्कृत भाषा का पूरा मान रखा गया।

इस दौरान बच्चों ने संस्कृत के कई वाक्यों तव नाम किम् अस्ति ? मम नाम पिंडी अस्ति। अहं त्वम् सर्वे पश्यामि नाटकम्…. यदा यदा ही धर्मस्य… के अर्थ को समझा। प्रस्तुति के अंत में बालक भरत का जन्म, जो संपूर्ण आर्यावर्त के चक्रवर्ती सम्राट बनते हैं। आपको तो मालूम ही होगा कि हमारे देश का नाम राजा भरत के नाम परभी भारतवर्ष रखा गया। एक बार फिर जोरदार करतल ध्वनि के साथ नाट्य प्रस्तुति का स्वागत किया गया। मंच पर शाकुंतलम् के मुख्य पात्रों को जीवंत करने वाले तीनों कलाकारों के अभिनय और उनकी ऊर्जा की प्रशंसा की गई। बच्चों ने अंकिता निकर्ड, सागरमौयर और श्रीराम चौधरी से कहा, थैंक्यू…आप हमारे स्कूल में फिर आना, एक और नई प्रस्तुति के साथ। इस प्रस्तुति के निर्देशक व स्क्रिप्ट राइटर रूपेश टिल्लू को मानव भारती की ओर से बहुत बहुत आभार।

कनाडा से आईं प्रमुख शिक्षाशास्त्री ब्रॉन वैन फेरी ने इस कार्यक्रम को यादगार बना दिया। मानवभारती संस्था से जुड़ीं ब्रॉन वैन हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, स्पेनिश सहित कई भाषा की जानकार हैं और भारतीय संस्कृति को जानने के लिए भारत दौरे पर हैं।

मानवभारती के निदेशक डॉ. हिमांशु शेखर ने आलोक उल्फत और उनकी टीम का आभार जताया। निर्देशक व अभिनेता आलोक उल्फत ने बच्चों से किसी एक म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट को जरूर सीखने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि आप किसी भी प्रोफेशन में जाएं पर आर्टव थियेटर को न भूलें, क्योंकि यह आपको जीना सिखाते हैं। मानवभारती स्कूल के संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ. अनंतमणि त्रिवेदी ने कहा कि संस्कृत से ही संस्कृति है। उन्होंने शाकुंतलम् के मंचन और बच्चों को संस्कृत में कुछ वाक्यों का ज्ञान कराने के लिए आलोक उल्फत और उनकी टीम का आभार व्यक्त करते हुए स्वागत किया।

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