सेतु समुद्रम् परियोजना बनाम ‘‘श्री राम सेतु’’

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विकासवाद मानव- समुदाय का यथोचित वाद है परन्तु यह विवादों का जनक या साम्राज्यवादि महाशक्तियों के इशारे पर हो, किसी धर्म, सम्प्रदाय या राष्ट्र के अहित में हो तो कथमपि उचित नही हंे सेतु समुद्रम् परियोजना समय बचत तथा भारत के आर्थिक लाभ की दृष्टि से सरकार द्वारा प्रायोजित की गई हैं।  वर्तमान में कोलकाता व मुम्बई के बीच का समुद्री यातायात का मार्ग श्रीलंका के उपर से पूरा चक्कर लगाकर जाने का हं अगर भारत व श्रीलंका के बीच स्वेज, पनामा की तर्ज पर समुद्री कनाल बनाई जाये तो समय में 16 घंटे की बचत के साथ-साथ 400 नाटिकल मील का अतिरिक्त वाहन व्यय भी बचता है।

माल भाड़ा के अधिक होने व समय अधिक लगने के कारण वस्तुएं महंगी हो रही हैं, इस कारण समय व व्यय की बचत करने हेतु भारत सरकार ने ‘‘सेतु समुद्रम् परियोजना’’ बनाई है जिसमें अभिज्ञयन्ताओं ने छः पर्यायी मार्ग सुझाये है; 2500-2600 करोड़ लागत वाली एक सर्वाधिक लम्बे मार्ग व व्यय की इस परियोजना को सरकार ने हरी झंडी देदी है। इस परियोजना के लागू होने से विश्व की बेमिसाल प्राचीन धरोहर ‘‘श्रीरामसेतु’’ को नष्ट करके ही समुद्री कैनाल बनाई जायेगी। ‘‘सेतु समुद्रम् परियोजना’’ लागू हो इससे सारा राष्ट्र सहमत है परन्तु इसके लिए 4 ऐसे मार्ग सुझाये गये हैं जिनके कारण सेतु व अन्य सभी आस्था स्थल तो सुरक्षित रहते ही हैं बल्कि वे मार्ग व्यय में सस्ते भी हैं तथा निर्विघ्न भी हैं।

राष्ट्रीय विकास कैसा भी हो प्रसन्नता सबको होनी चाहिये किन्तु विकासवाद को सेतु बनाकर श्री राम सेतु के अस्तित्व को नकारना श्रीराम का वैज्ञानिक आधार पर बहस होना; निश्चित ही भारत वर्ष के लिए विकासवाद का वैचारिक सुनामी है। श्री राम सेतु जहां प्राचीन विज्ञान का प्रमाण है वहीं सनातन हिन्दुओं के आस्था का केन्द्र भी। श्रीराम सेतु का वर्णन भारतीय इतिहास ग्रन्थों एवं काव्य ग्रन्थों में सर्वत्र व्याप्त है। कुछ वर्ष पूर्व नासा ने उपग्रह द्वारा समुद्र के भीतर के खींचे चित्रों को प्रकाशित करते हुए घोषणा की कि भारत व श्री लंका के बीच एक सेतु है, वह 30 मील याने 48 कि0मी0 लम्बा हैं नीचे से 2 मील याने 3 किमी0 के लगभग चौड़ा है। विभिन्न अध्ययनों तथा प्रयोगों से पता चलता है कि उसकी आयु 17 लाख वर्ष है। नासा ने केवल इतना ही मात्र नहीं बताया परन्तु यह जानकारी मिलते ही विश्लेषकों ज्यतिषियों, विद्वानों व वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया कि कालगणना के अनुसार आज कलयुग की 5108वीं अर्थात् 52वीं शदी है। इससे पूर्व द्वापर युग 8 लाख 64 हजार वर्ष का और त्रेता युग 12 लाख 16 हजार वर्ष का है। श्रीराम त्रेता युग के मध्य से पूर्व और भगवान श्रीकृष्ण द्वापर युग के अन्त में अवतरित हुए। इस प्रकार से गणना करने पर एक सत्य सामने आया कि यह सेतु श्री राम के समय का ही है। इस सेतु का ऐतिहासिक कथन श्रीलंका विजय अर्थात रावण के संहार हेतु सेतु निर्माण का वर्णन रामायण में मिलता है।

इसलिए यह सेतु प्रभु श्रीराम के नेतृत्व में धर्म संस्थापन हेतु नल,नील जैसे कुशल अभियन्ता (इन्जीनियर) व हनुमान जैसे कुशल प्रबन्धक तथा करोडों वानर सैनिक एवं योद्धाओं के प्रयत्नों से निर्मित हुआ है। उस समय इसका नाम सेतु ही था परन्तु वर्तमान में जनभावनाओं ने इसे ‘‘श्री राम सेतु’’ कहना प्रारम्भ कर दिया है। अनेक पुस्तकों में इसे श्री सेतु के नाम से भी जाना जाता है।

भारत सरकार के ‘‘सर्वे डिपार्टमेन्ट’’ के एलबम पर ‘‘आसेतु हिमाचलम् लिखा है। ब्रिटिश व मुगलकालीन दस्तावेज बताते हैं कि सन् 1480 ई0 तक इस सेतु पर लोगों का आवागमन था। उस समय एक बड़ा समुद्री तूफान आया जिसके कारण यह सेतु ऊपर से 3 से 30 फीट तक पानी में नीचे चला गया। अभी-अभी सुनामी लहरों के कारण भारी विनाश हुआ। पूर्व में वैज्ञानिकों ने कहा कि तमिलनाडू व केरल विनाश से बचा इसका प्रमुख कारण यह सेतु ही है। अगर यह सेतु नही रहा तो दक्षिण भारत समुद्र के गर्भ में समा जायेगा। भारत के विभिन्न ग्रन्थों में इस सेतु का वर्णन मिलता है तथा आज भी प्रमाण प्राप्त है कि वहां का समाज इस सेतु को पवित्र मानकर पूजा करता है। यह इतिहास की मानवीय व उच्च सांस्कृतिक जीवन – मूल्यों से ओतप्रोत मानव निर्मित वह निधि है जो अनेक आविष्कारों का आधार है।

श्रीरामसेतु के प्रमाण में ये श्लोक वाल्मीकि रामायण में मिलते हैं – ‘‘एष सेतुं महोत्साहः करोतु मयि वानरः’’। समुद्र ने श्रीराम से कहा- आपकी सेना में ‘नल’ विश्वकर्मा का पुत्र हे। विश्वकर्मा ने इसे अपने समान निपुण होने का वरदान दिया था। यह मेरे उपर सेतु का निर्माण करे, मैं उस सेतु को धारण करूंगा। नल ने कहा- मैं समुद्र पर सेतु बांधने में सक्षम हूँ। अतः आज से ही सेतु बांधने का कार्य वानरगण प्रारम्भ करें-

समर्थश्चाप्यंह सेतुं कर्तुं वै वरूणालये।
तस्मादद्यैव बध्नन्तु सेतुं वानरपुडवाः।।
श्रीरामसेतु का इससे बड़ा शास्त्रीय तथा ऐतिहासिक प्रमाण अन्य नहीं हो सकता। रामायण के युद्धकाण्ड श्लोक संख्या 56.57.58.59.-22 वें सर्ग में यहां तक बताया गया कि इस सेतु में कितने दिन और किन वस्तुओं का प्रयोग हुआ था। सेतु का निर्माण प्रथम दिन 14 योजन, द्वितीय दिन 20 योजन, तृतीय दिन 21 योजन, चतुर्थ दिन 22 योजन और पंचम दिन 23 योजन हुआ था। 14 योजन = 111.58 किलोमीटर, 20 योजन = 159.40 कि0मी0, 21 योजन = 167.37 कि0मी0, 22 योजन = 175.34 कि0मी0, 23 योजन = 183.31 कि0मी0, कुल योग = 797 किलोमीटर।

विशालः सुकृतः श्रीमान् सुभूमिः सुसमाहितः।
अशोभत महान् सेतुः सीमन्त इव सागरे।।
श्रीराम सेतु विशाल, सुन्दर, शोभा युक्त, समतल और सुसम्बद्ध ‘‘ परस्पर जुटी हुई शिलाओं वाला ’’ था।
17 लाख 50 हजार वर्ष प्राचीन श्रीरामसेतु ‘‘नलकृत’’ को आज तोड़ने समाप्त करने का उपक्रम साम्राज्यवादियों के द्वारा इसलिए किया जा रहा है कि हिन्दु समाज अपनी गौरवशाली स्मृति को विस्मृत हो जाए और आसानी से उसे संस्कृति गौरव से हीन किया जा सके। आवश्यकता एकजूटता, जनजागरण तथा अपने इस ऐतिहासिक, सांस्कृतिक धरोहड़ को पहचानने, बचाने तथा सुरक्षा कवच प्रदान करने की है; जिससे हम इस राष्ट्र वैभव श्रीरामसेतु का संरक्षण कर सकें।

  • डाॅ. अनन्तमणि त्रिवेदी
    मानव भारती इंडिया इंटरनेशनल स्कूल देहरादून

 

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