मानवभारती के बच्चों की संस्कृत सृजनशीलता

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बच्चों को संस्कृत शिक्षा- डाॅ. अनन्तमणि त्रिवेदी

अगर आप हैं चाहते बालकों को विनय-शील – सम्पन्न शिक्षित बनाना।
तो बचपन से उनको सरल रीति से है,

उचित नित्य संस्कृत पढ़ाना- लिखाना।।

ये बच्चे जो बचपन में संस्कृत पढेंगे,
चरणवन्दना गुरूजनों की करेंगे।
सदा शिष्ट वातावरण में रहेंगे,
तो निश्चित विनयशील शाली बनेंगे।।
अगर देश में शिष्टिता- सभ्यता का
वही चाहते पुण्यधारा बहाना
तो बचपन से ही चाहिये बाल बच्चों
को संस्कृत व संस्कृति से परिचित कराना।।


मनुष्य को महान बनाने वाले गुण- स्नेहा पंवार, कक्षा- 5
अष्टौ गुणाः पुरूषं दीपयन्ति
प्रज्ञा च कौल्यं च दमः श्रुतं च।
पराक्रमश्चाबहुभाषिता च
दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च।।
अर्थात् ये आठ गुण पुरूष को महान बनाते हैं – प्रज्ञा, कुलीनता, इन्द्रियों का संयम, अध्ययन, पराक्रम, बहुत न बोलना, यथाशक्ति दान और कृतज्ञता। अतः हम पढ़ने वाले विद्यार्थियों को इनका अनुसरण करना चाहिए।
विदुरनीति


प्रातः स्मरणम्- वेदांश किमोठी,कक्षा- 3
कराग्रे वसते लक्ष्मीः
करमध्ये सरस्वती।
करमूले तु गोविन्दः
प्रभाते करदर्शनम्।।

प्रातः काल में (पुरूषार्थ के प्रतीक अपने ) हाथों का दर्शन करें। (क्योंकि) कर तल के अग्रभाग में लक्ष्मी का निवास है, कर (हाथ) के मध्य में सरस्वती का और कर के मूल में गोविन्द का निवास है। अर्थात् पुरूषार्थ या कर्तव्य कर्म के मूल में सब प्रकार के धन धान्य की अधिष्ठात्री लक्ष्मी और भक्ति के दाता (गोविंद) का ध्यान और कर के मध्य में ज्ञान विज्ञान की देवी सरस्वती की साधना करने के परिणामस्वरूप सब प्रकार की समृद्धि प्राप्त होगी यही तात्पर्य है।


नीतिशिक्षा- निकिता दरमोड़ा, कक्षा- 8
सत्यं वद धर्मं चर
सच बोलो धर्म करो।
पीडित जन दुःखं हर
दुखियों का दुःख हरो।
क्षुधितानामुदरं भर
भूखों का पेट भरो।
धीरो भव वीरो भव
धीर बनो वीर बनो।
शिष्टों भव सभ्यो भव
शिष्ट बनो सभ्य बनो।
हृष्टो भव पुष्टों भव
हृष्ट बनो पुष्ट बनो।
शुद्धं पठ शुद्ध पढो
स्वच्छं लिख साफ लिखो।
सभ्यो भव सभ्य बनो
शान्तो भव शान्त रहो।


अथर्ववेद का शान्ति पाठ- मिमांशा किमोठी, कक्षा- 8

ऊँ द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः
शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः
शान्तिब्रह्म शान्ति सर्वशान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा
शान्तिरेधि।। ऊँ शान्तिः । शान्तिः।। शान्तिः।।।
द्युलोक, अन्तरिक्ष और पृथ्वी सभी शान्ति एवं कल्याण देने वाले हों। सभी जल, औषधियां और वनस्पतियाँ हमें सुख शान्ति प्रदान करें। सभी देवता, परब्रह्म परमेश्वर और सभी सम्मिलित रूप में शान्ति देने वाले हों। आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक सभी प्रकार की शान्ति हो। वह शान्ति हममें सदैव वृद्धि को प्राप्त हो।


यह हमारी देवभाषा- आयुषी रतूड़ी,कक्षा -6
यह हमारी देवभाषा
लोक दुर्लभ दिव्य – भाषा
विश्व में अति भव्य भाषा
यह चिरन्तन भी तरूणातर
यौवना अति नव्य भाषा।
यह हमारी देवभाषा…………………..।
यह हमारी धर्मभाषा
भक्ति भूषित कर्म भाषा
यह हमारी ज्ञानयुत-
विज्ञान – भाषा नर्भ भाषा।
यह हमारी ……………………….।
यह हमारी लोक भाषा
पूजिता परलोक भाषा
यह गहन अज्ञान पथ की
दिव्यतम आलोक भाषा।
यह हमारी ………………………………।
यह हमारी यन्त्र भाषा
पाठ पूजा तन्त्र भाषा
योग योग समाधि जम- तम-
साधनामय मन्त्र भाषा।
यह हमारी ………………………………….।
यह हमारी वन्द्य भाषा
विश्व जन अभिनन्द्य भाषा
यह मृदुल कमनीय कविता-
मधुर मधु निःस्यन्द भाषा।
यह हमारी…………………………………।
श्रान्त जन विश्रान्ति भाषा
क्लान्त आनन कान्ति भाषा
शोक सिन्धु निमग्न मानव-
धैर्य संयम शान्ति भाषा।
यह हमारी ……………………………….।

वन्दना- प्राची पाण्डे, कक्षा – 6
देव वरूण! त्वं कुरू
कालवृष्टि – वर्षणम्
समस्य – वर्धनोचितं
जीवसौख्य – दायकम्।।
रक्ष रक्ष जलपते!
क्षामतो धरामिमाम्
प्राणि- पक्षि- सकुंल
भवतु फल- जलान्वितम्
धान्य – वृद्धिरन्वहं,
सुखकरी भवेत्सदा।
लोकतुष्टि – कारकं
कुरू सकाल – वर्षणम्।।


वन्दनम्- अर्पित ठाकुर, कक्षा – 4
ऊँ सरस्वति! नमस्तुभ्यं, वरदे कामरूपिणि।
विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा।
अर्थात् -सभी इच्छाओं की पूर्ति करने वाली है,
माँ सरस्वती हम सब तुम्हें प्रणाम करते हैं।
हम सब विद्या का शुभ आरम्भ करने जा
रहे हैं, इस कार्य में हमेशा हमारी सिद्धि हो।


अभिलाषः- दिया पंवार, कक्षा- 5
वीर – बालकाः वयम्
वीर बाल हम सभी।
वीर बालकाः वयम्
वीर बाल हम सभी
सागरं समुत्तरेम सागर को पार करें।
गगनतले उत्पतेम आसमान में उडं़े।।
भूतले जमीर पर
पर्वते पहाड़ पर।
उत्सवे उमंग में
संग्रामे जंग में
सर्वतो वयं जयेम, सब जगह विजय करें।
निर्भयाः सदा भवेम, सर्वदा निडर रहें।।
नो कदापि वित्रसेम
त्रस्त हों नही कभी।
वीर बालकाः वयम्
वीर बाल हम सभी।।


सत्संगति- कनिका सुरियाल, कक्षा- 6
जाड्यं धियो हरति सिंच्चति वाचि सत्यं
मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति।
लक्ष्मीं तनोति वितनोति च दिक्षु कीर्तिं
सत्संगतिः कथय किं न करोति पुंसाम्।।
अर्थात- सत्संगति बुद्धि कि जड़ता को दूर करती है वाणी में सच्चाई लाती है सम्मान में वृद्धि करती है पाप को दूर करती है चित्त को निर्मल बनाती है तथा सभी दिशाओं में कीर्ति फैलाती है। कहो सत्पुरूषों की संगति मनुष्यों का क्या लाभ नहीं करती?


बाल- अनुशासनम्- अनिशा, कक्षा – 5
प्रातः काले ईशवन्दनम्
तदा जनक – जननी पदनमनम्
शय्यात्यागे दन्तधावनम्
व्यायामान्ते देहमज्जनम्
तदनुभोजनं शालागमनम्
तत्र सदा गुरूचरणवन्दनम्।
पठन लेखनं तथा क्रीडनम्
विनयधारणं सत्यभाणणम्
राष्ट्रं प्रति कत्र्तव्यपालनम्
सदा स्वच्छ भाव- प्रकाशनम्
सद् बालानां इदं वर्तनम्
सद् छात्राणाम् इदम् आचरणम्।


प्रियतम देशः- भारत देशःकिरन, कक्षा – 6
एष मदीयः प्रियतम – देशः – भारत देशः
यह है मेरा प्यारा देश – भारत देश
एष मदीयः प्रियतम- वेषः – सरलो वेषः
यह है मेरा प्यारा वेष – सादा वेष
इयं मदीया दिव्या भाषा – संस्कृत भाषा
यह है मेरी अनुपम भाषा – संस्कृत भाषा
देशधर्मयोः महती आशा – महती आशा
देश धर्म की महती आशा – महती आशा
एतत् सेवां सदा करिष्ये – सदा करिष्ये
इनकी सेवा सदा करूंगा – सदा करूंगा
एतत्कष्टं सदा हरिष्ये – सदा हरिष्ये
इसका संकट सदा हरूंगा – सदा हरूंगा।

सर्वे भवन्तु सुखिनः ……………………………………….. सभी सुखी रहें।


वन्दे मातरम्- मल्लिका ठाकुर, कक्षा – 8
माता भूमिः पुत्रोऽहं पुथिव्याः
दुर्लभं भारते जन्म मानुषं तत्र दुर्लभम्।
वन्दे मातरम्।
सुजलां सुफलां मलयज – शीतलाम्
शस्य – श्यामलां मातरम्।
वन्दे मातरम्।
शुभ्र – ज्योत्सना पुलकित यामिनीम्
फुल्ल कुसुमित दु्रमदल शोभिनीम्
सुहासिनीम्, सुमुधर- भाषिणीम्
सुखदां वरदां मातरम्।
वन्दे मातरम्।


कन्याकुमारी- स्वराज सिंह नेगी, कक्षा – 7
कन्या कुमारी भारतस्य दर्शनीयं तीर्थस्थानम् अस्ति।
इदं भारतस्य दक्षिणे भागे अस्ति।
अत्र अरबसागर – हिन्द महासाग्स्य संगमः अस्ति।
अत्र स्वामी विवेकानन्दस्य प्रसिद्धं स्मारकम् अस्ति।
अत्र सुर्योदयः चन्द्रोदयः अतिशोभिते।
भारतस्ये विविधेभ्यः भागेभ्यः जनाः अत्र आगच्छन्ति।
अत्र कन्याकुमारी मन्दिरम् अस्ति।
अत्र भारतवर्षस्य एकता दृश्यते।
समुद्रतटे प्राकृतिकं सौन्दर्यं दृष्यते।
सर्वे जनाः पुष्पाणि ग्रहीत्वा कन्याकुमारी मन्दिरं गच्छन्ति।


गुरूवंदना- विमल भट्ट, कक्षा- 7
वंदे स्वपितरं नित्यं पठने – पाठनेरतम्।
सुधियं धार्मिक विज्ञभावुकं वचनाभिधम्।।
वंदे गुरूवरं देवं निष्पक्षं सत्यवदिनम्।
पठने- पाठनेलग्नं सरलं जनकाभिधम्।
वंदे गुरूवरं देवं निर्हेतुककृपावितम्।
मम् प्राणसुरक्षार्थं शिवरूपं जगत्पातिम्।।
वंदे गुरूवरं देवं सूर्यानंद मनस्विनम्ं।
सरल सात्विकं सम्यक् शिष्याणां हितचितंकम्।
वंदे वक्तृत्वसम्पन्नं कृष्णदेवं गुरूं शुभम्।
तार्किकं धार्मिकं विज्ञं स्वाध्याये निरतं सदा।।


 साहिल पुण्डीर, कक्षा – 8

यः प्रीणयेत् सुचरितैः पितंर सपुत्रः।
अर्थात्ः- जो सुन्दर चरित्रों से पिता को प्रसन्न करे वही पुत्र है।


छात्रों के लिए अनुकरणीय वेद- वाणी- मणिका त्रिवेदी, कक्षा – 6

सं गच्छध्वं सं वदध्वम् – ऋग्वेद
सभी मिलकर चलो और मिलकर बोलो।
स्वस्ति पन्थामनुचरेम – ऋग्वेद
हे प्रभो! हम सब कल्याण मार्ग के पथिक बनें।
तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु – यजुर्वेद
मेरा मन उत्तम संकल्पों वाला हो।
मा गृधः कस्य स्विद्धनम् – यजुर्वेद
किसी के धन पर लालच मत करो।
कृधी नो यशसो जने – सामवेद
हमें अपने देश में यशस्वी बनाओ।
अहं प्रवदिता स्याम – सामवेद
मैं सर्वत्र प्रगल्भता से बोलने वाला बनूं।
सर्वा आशा मम मित्रं भवन्तु – अथर्ववेद
हमारे लिए सभी दिशाएं कल्याणकारिणी हों।
मधुमतीं वाचमुदेयम् – अथर्ववेद
मैं सदा मीठी वाणी बोलूं।


विद्यायाः फलम् – स्वाती राणा, कक्षा – 6
विद्या ददाति विनयम् , विद्या ददाति वित्तम्
विद्या सदा जनानाम् विमलं करोति चित्तम्।
विद्या तनोति कीर्तिम् विद्या तनोति मानम्
विद्या नरं समाजे कुरूते सदा प्रधानम्।
विद्या निहन्ति दोषम् विद्या निहन्ति भारम्
दूरीकरोति विद्या सकलं मनो – विकारम्
विद्यांन राज- हार्या विद्या न चोर – हार्या
विद्या कदापिलोके नाहिबन्धुभिः विभाज्या
विद्या गुणः प्रधानः विद्या धनं प्रधानम्
देशे तथा विदेशे विद्या बलं प्रधानम्।


दीपस्तुतिः- आदिल खान, कक्षा – 7
शुभं कुरू त्वं कल्याणम्
आरोग्यं धनसम्पदः
शत्रुबुद्धि विनाशाय
दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते।।
दीपज्योतिः परं ज्योतिः
दीपज्योतिर्जनार्दनः
दीपो हरतु मे पापं
दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते।।
आत्मज्योतिः प्रदीप्ताय
ब्रह्मज्योतिर्नमोऽस्तुते।।
ब्रह्म ज्योतिः प्रदीप्ताय
गुरूज्योतिर्नमोऽस्तुते।।


भारतीय संस्कृति – एक महान संस्कृति- सोहम दत्ता, कक्षा- 9
इस पृथ्वी पर संस्कृति का प्रथम सूर्योदय कहाँ हुआ?
विश्व में सर्वप्रथम ज्ञान, विज्ञान, सभ्यता का उजाला सर्वप्रथम कौन सी संस्कृति ने किया?
वह थी महान भारतीय संस्कृति !!!

1- तो आइये हम हमारी सनातन भारतीय संस्कृति की एक झलक देखेंः-

  • भारतीय संस्कृति एक अद्भुत संस्कृति है।
  • यह संस्कृति विश्व की सभी संस्कृतियों की जननी है।
  • इस संस्कृति की गोद में जन्म लेना अति दुर्लभ है, शास्त्रों ने कहा है ‘‘दुर्लभ भारते जन्म’’…………..

2-अब हम अपनी संस्कृति की तीन प्रमुख विशेषताओं को देखेंगे-

  • यह संस्कृति सबसे प्राचीन एवम जीवंत संस्कृति है।
  • यह सबसे पवित्र है।
  • यह वैज्ञानिक संस्कृति है।

1- भारतीय संस्कृतिः- सबसे प्राचीन तथा जीवन्त संस्कृति-
भिन्न- भिन्न स्थानों से प्राप्त पुरातत्वीय अवशेषों के आधार पर वैज्ञानिक का कहना है, कि यह संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन दस हजार वर्ष पुरानी संस्कृति है।
विद्वानों का कहना है, कि ऋग्वेद विश्व का सबसे प्राचीनतम ग्रन्थ हैं।

विश्व का इतिहास कहता है, कि इंग्लैड ग्रीस, तथा रोम आदि यूरोपिय देश में जिस समय मनुष्य जंगली अवस्था में थे, उस समय हमारे पूर्वज आर्य बहुत विकसित जीवन जीते थे।
विश्व की तमाम संस्कृतियां खत्म हो चुकि है, लेकिन भारतीय संस्कृति आज भी जीवित है।

2- भारतीय संस्कृतिः- एक पवित्र संस्कृतिः- संसार में अनेक संस्कृतियां है, परन्तु भारतीय संस्कृति एक पवित्र संस्कृति है क्योंकि इस संस्कृति में विचार आचरण तथा अन्य सभी धार्मिक परम्पराओं को अधिक जोर दिया गया है।

3- भारतीय संस्कृति एक वैज्ञानिक संस्कृतिः- आधुनिक कहे जाने वाले कुछ वैज्ञानिक अविष्कारों के विषय में भारतीय संस्कृति के महान ऋषियों ने आज से हजारों वर्ष पहले ही खोज कर ली थी।
अंतरिक्ष विज्ञान की नींव रखी भारतीय संस्कृति ने; विद्वानों का कहना की अरबस्तान और युनान के लोगों ने अंतरिक्ष विज्ञान भारत से ही सीखा है।
पृथ्वी के व्यास का मापन सर्वप्रथम भारतीय संस्कृति ने ही किया है।
पृथ्वी गोल है, इतना ही नहीं इसका गोलाई का व्यास का सर्वप्रथम व्यास भी भारत ने ही किया था, भारतीय वैज्ञानिक आर्यभट्ट ने अपने आश्रम में बैठे ही अपने गणित से पृथ्वी का व्यास का मापन किया था, और व्यास का अध्य 7905 मील और आधुनिक साधनों द्वारा पृथ्वी का व्यास का आयत 7918 अर्थात् केवल 13 मील का ही अन्तर है।
गुरूत्वाकर्षण के विषय में सर्वप्रथम भारतीय वैज्ञानिक भाष्कराचार्य ने कहा था।
केवल शून्य ही नही परन्तु अन्य अंकों की भी खोज भारत ने ही की थी।
भारत ने आधुनिक गणित की नींव बीजगणित विश्व को प्रदान की , आज से हजार वर्ष पूर्व महान आचार्य भाष्कराचार्य ने लीलावती ग्रन्थ लिख विश्व को बीजगणित प्रदान की थी।
सुमिती की नींव भी भारत ने ही रखी थी।
विश्व के प्रथम फिजिशियन थे एक महान ऋषि चरक उन्होंने चरक संहिता लिखा; कैन्सर सहित अनेक रोगों के लक्षण एवं उपचार का ज्ञान दिया।
भारत के महान ऋषि सुश्रुत आज से कम से कम 2700 वर्ष पूर्व उन्होने शरीर पर सर्जरी करके रोगों को दूर करने की वैज्ञानिक पद्धति विकसित की थी।
भारतीय संस्कृति विश्व की सर्वप्रथम सुशिक्षित तथा सुविकसित संस्कृति थी, इस संस्कृति का सर्वप्रथम विश्वविद्यालय तक्षशिला विश्वविद्यालय विद्या की गढ थी।
हजारों वर्ष पुरानी भारतीय संस्कृति पर अनेक आक्रमण होने के बाद भी टिकी हुई है, इसके मुख्य कारण इसके अदभुत आधारस्तम्भ है।
शास्त्र मन्दिर और संत
सत्यापन
जंहा उत्तर में गंगा, सरस्वती और सिंधु का पवित्र जल बहता है, जहां दक्षिण में महासागर गर्जन करते हंै, ऐसे भारत में अपनी मातृभूमि से इस पवित्रभूमि पर गुंज उठा संस्कृति का पवित्र नाद।
कैसा भव्य तथा गौरवशाली है। हमारी भारतीय संस्कृति व इतिहास।
आइये, इसकी रक्षा का संकल्प लें।


सर्वधर्म प्रार्थना- योगराज मालदिया, कक्षा- 7
मानव भारती- एकता मन्त्रः

यं वैदिका मन्त्रदृशः पुराणा
इन्द्रं यमं मातरिश्वानमाहुः।
वेदान्तिनोऽनिर्वचनीयमेकं
यं ब्रह्मशब्देन विनिर्दिशन्ति।।
शैवा यमीशं शिव इत्यवोचन्
यं वैष्णवा विष्णुरिति स्तुवन्ति।
बुद्धस्तथाऽर्हन्निति बौद्धजैनाः
सत्-श्री-अकालेति च सिक्ख सन्तः ।।
शास्तेति केचित् कतिचित् कुमारः
स्वामीति मातेति पितेति भक्त्या।
यं प्रार्थयन्ते जगदीशितारं
स एक एव प्रभुरद्धितीयः।।

भावार्थ- प्राचीन काल के मन्त्र काल के मन्त्रद्रष्टा ऋषियों ने जिसे इन्द्र, यम, मातरिश्वान् कहकर पुकारा और जिस एक अनिर्वचनीय को वेदान्ती ‘ब्रह्म’ शब्द से निर्देश करते हैं, शैव जिसको शिव और वैष्णव जिसको विष्णु कहकर स्तुति करते हैं, बौद्ध और जैन जिसे बुद्ध और अर्हत् कहते हैं मुस्लिम भाई जिसे अल्लाह ताला कहते हैं तथा सिक्ख सन्त जिसे सत् श्री अकाल कहकर पुकारते हैं जिस जगत् के स्वामी को कोई शास्ता तो कोई कुमारस्वामी कहते हैं, तो कोई स्वामी, माता, पिता कहकर भक्तिपूर्वक प्रार्थना करते हैं- वह प्रभु एक ही है और अद्वितीय है अर्थात् जिसका कोई जोड़ नहीं है। हम सब उस अद्वितीय सर्वशक्तिमान ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह सबको उत्तम संकल्पों वाला बनाये सबका मार्ग प्रशस्त करे। सभी सुखी हों सभी निरोगी हों, सभी एक दूसरे को प्रेम से कल्याण की भावना से देखेें तथा कोई कभी दुःखी न हो।


संस्कृत सूक्तियाँ- प्राची रावत,कक्षा- 4

विद्या धनं सर्व धनं प्रधानम्।
विद्या धनं सभी धनों में प्रधान है।
सत्यमेव जयते नानृतम्।
सत्य की विजय होती है झूठ की नहीं।
अहिंसा परमो धर्मः
अहिंसा परम धर्म है।
लोभः पापस्य कारणम्।
लोभ पाप का कारण है।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।
माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढकर है।
वीरभोग्या वसुन्धरा।
पृथ्वी वीरों द्वारा ही भोगने योग्य है।
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
परिश्रम से ही कार्य सिद्ध होते हैं केवल इच्छाओं से नहीं।
साहसे श्रीः वसति।
साहस में श्री लक्ष्मी निवास करती है।


चुन्नू – मुन्नू – शौर्य भट्ट, कक्षा- 2
एतौ बालौ – ये दो बच्चे
चुन्नू मुन्नू – चुन्नू – मुन्नू
सदा खेलतः – सदा खेलते
इतो धावतः – इधर दौड़ते
ततो धावतः – उधर दौड़ते
बारं बारं पततः – बार बार गिर जाते
यदपि लभेते – जो कुछ पाते
सर्वं वदने क्षिपतः – सब कुछ मुँह में रखते
सर्पं सर्पं चलतः – सरक सरक कर चलते
सततं हसतः – हरदम हंसते।
किन्तु बुभुक्षा यदा बाधते – किन्तु भूख जब लगती
तारं रूदतः – खूब जोर से रोते
मातुः सविधे ब्रजतः – माँ के पास पहुंचते
सम्यक् दुग्धं पीत्वा – खूब दूध पीकर
मुदितौ भवतः – खुश हो जाते
पुनः खेलितुं ब्रजतः – पुनः खेलने जाते
सर्वं मुदितं कुरूतः – सबको खुश कर देते।
एतौ बालौ – ये दो बच्चे
चुन्नू मुन्नू – चुन्नू मुन्नू

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