पुराणों में पर्यावरण

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  • डाॅ. अनन्तमणि त्रिवेदी

प्राक्कथन अश्वत्थो वटवृक्षचन्दनतरूर्मन्दार- कल्पद्रुमौ ।
जम्बू-निम्ब-कदम्ब-चूत-सरला वृक्षाश्च ये क्षीरिणः।।
सर्वे ते फलमिश्रिताः प्रतिदिनं विभ्राजिता सर्वतो।
रम्यं चैत्ररथं सनन्दनवनं कुर्वन्तु नो मंगलम्।।
भारतीय धार्मिक साहित्य पर्यावरण के विविध- विविधताओं से ओतप्रोत है तथा इससे मानव जीवन एवं संसारिक अन्य प्राणियों का भी संरक्षण संवर्द्धन होता रहता है। यूं तो भारतीय धार्मिक साहित्य अत्यन्त विशाल तथा बहुआयामी है फिर भी इसका अध्ययन सम्भावित है।

डॉ. अनंतमणि त्रिवेदी

हम यहां भारतीय धार्मिक साहित्य के एक विशेष साहित्य पर चर्चा करने जा रहे हैं जो ‘‘पुराण’’ के नाम से धार्मिक साहित्य में जाना जाता है। जी हां वही पुराण जिसका धार्मिक विवेचन ही हमारा जीवनमूल्य; जीवनशैली है।
पुराणों में पर्यावरण के व्यापक दृष्टिकोण को जानने से पूर्व पुराण के वैशिष्ट्य तथा लक्षण से अवगत होना अत्यन्त आवश्यक है अतः सर्वप्रथम पुराण शब्द की व्युपत्ति, पुराण के लक्षण, पुराणों की संख्या तथा पुराणों का महत्व जान लेते हैं ततः ‘‘पुराणों में पर्यावरण’’ पर पुराणकार का पर्यावरण प्रेम देखकर लाभान्वित होने का प्रयास करेंगे।
पुराण शब्द की व्युत्पत्ति- पुराण शब्द की व्युत्पत्ति विद्वद् वरेण्य श्री अमर सिंह ने ‘‘पुराणं पत्र्च लक्षणं’’ अपने अमरकोश में संकेतात्मक दी है परन्तु इस शब्द की निरूक्ति आचार्य पाणिनि आचार्य यास्क एवं पुराणों ने स्वयं दी है-
पुराण शब्द पुरा अव्यय पूर्वक णीञ् प्रापणे धातु से ‘अ’ प्रत्यय करने पर बनता है।
पुरा$नी$अ=पुराण/अथवा पुराभवं पुराणम अर्थात् (पहले होने वाला) इस अर्थ में ‘‘सायं चिरं-प्राह्णेप्रगेव्ययेभ्यष्ट् युट्युलौ तुट् च’’ इस सूत्र के अनुसार पुरा से ‘ट्यु’ प्रत्यय करने तथा ‘तुट् का आगम होने पर पुरातन शब्द सिद्ध होता है; परन्तु अष्टाध्यायी के दो सूत्रों में महर्षि पाणिनि ने ‘‘पूर्वकालैक सर्व जरत्पुराण नवकेवलाःसमाना धिकरणेन’’ तथा ‘‘ पुिराणप्रोक्तेष् ब्राह्ममणकल्पेषु’’ में पुराण शब्द का प्रयोग किया है जिससे तुडागम का अभाव निपातनात् सिद्ध होता है। या ‘ट्यु’ प्रत्यय के अनुबन्ध का लोप हो जाने पर ‘युवोरनाकौ’ से अन् तथा ‘अट्कुप्वाड.नुम् व्यवायेपि’ से णत्व हो जाने पर ‘पुराण’ शब्द निष्पन्न होता है। ग्रन्थ सामान्य का वाचक होने से ‘‘पुराणम्’’ शब्द नपुंसक लिगं ही प्रयुक्त होता है।
पुराण-शब्द का लक्षण-
पुराणों की पञ्चलक्षणता प्रसिद्ध है ये पांच लक्षण प्रायः कई पुराणों में घुमाफिराकर किंचित् पाठ भेद से या ज्यों का त्यों मिलते हैं यथा-
सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च।
वंश्यानुचरितं चैव पुराणं पंचलक्षणम्।।
सर्ग (सृष्टि)ः प्रतिसर्ग (लय और पुनः सृष्टि); वंश (देवताओं की वंशावलि); मन्वन्तर (मनु के काल विभाग) और वंशानुचरित (राजाओं के वंशवृत्त)- पुराणों के ये पांच लक्षण हैं।
इन पंच लक्षणों के अतिरिक्त पुराणों के दस लक्षण भी प्राप्त होते हैं जिनका उल्लेख श्रीमद्भागवद् में स्पष्टरूप से किया गया है।
पुराणों की संख्या तथा महत्व-
अष्टादशपुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्।।
इस ऐतिहासिक प्रसिद्ध श्लोक से पुराणों की संख्या में संशय नही होना चाहिए अतः पुराणों की संख्या अष्टादश (18) ही है ऐसा शास्त्रिय तथा सामाजिक दोनों प्रमाण मिलते हैं।
मद्वयं भद्वयं चैव बत्रयं वचतुष्टयम्।
अनाप लिंग कूस्कानि पुराणनि प्रचक्षते।।
अर्थात्
मकार से दो पुराण-मत्स्य, मार्कण्डेय
भकार से दो- भागवत्, भविष्य
बकार से तीन- ब्रह्म ब्रह्मवैवर्त, ब्रह्माण्ड
वकार से चार- विष्णु, वायु, वाराह, वामन,
अग्नि, नारद, पद्म लिंग, गरूण, कूर्म
और स्कन्द पुराण।
आर्यजाति के जन जीवन में पुराणों का बडा महत्व है। भारतीय वाड्.मय की आधार-शिला में वेद के अर्थ ज्ञान के लिए पुराणों का अध्ययन अनिवार्य माना गया है। इतिहास और पुराणों के माध्यम से ही वेद के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो सकता है। यही प्रमुख कारण है कि उपनिषदों में महाभारत आदि ऐतिहासिक ग्रन्थों के साथ पुराणों को भी पत्र्चम वेद के रूप में स्वीकार किया गया है-
स होवाच ऋग्वेदंऽभगवो ध्येमि यजुर्वेदं सामवेदमाथर्वणम्।
चतुर्थमितिहासं पुराणं पञ्चमं वेदानां वेदमिति।।
अर्थात् मैं (जिज्ञासु) ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद के अध्ययन के साथ पञ्चम वेदरूप इतिहास और पुराण का भी अध्ययन करूंगा। वेद के वास्तविक अर्थ के परिज्ञान के लिए पुराणों के अध्ययन का महत्व व्यक्त करते हुए कहा भी गया है-
इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत्।
बिभेत्यल्पश्रुताद्वेदो मामयं प्रहरिष्यति।।
भारतीय वाड्.मय में पुराणों के आविर्भाव ने विनष्ट होती हुई आर्य जाति को बचाया है। अतः यदि पुराण युग को भारतीय संस्कृति, सभ्यता एवं आचार-विचार का सुधारक युग कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी। अस्तु सौभाग्यवश स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् कई अनुसंधानताओं ने पुराणों पर अनुसंधान किया है और कर रहे हैं। इससे अवश्य ही पुराणों के तथ्यों का उद्धाटन होगा और हम पुराणों के महत्व को और अच्छी तरह से जान सकेंगे।
पुराणों में पर्यावरणः-
यदि यह कहा जाय कि सम्पूर्ण सृष्टि वृक्षों पर आश्रित है तो अतिशयोक्ति न होगी। जहां वृक्षों की उपेक्षा हुई वहां विनाश हुआ, जहां इन्हें महत्व दिया गया वहां सतयुगी सुख की अविरल गंगा प्रवाहित होती रही। कई हजार वर्षों का हमारा विश्व इतिहास इसका साक्षी है। मनुष्य का उद्भव वनों में हुआ है। इनके पूर्वज करोडों वर्षों से वनों पर ही आश्रित जीवन व्यतीत करते रहे हैं- अतः मनुष्य के जेहन में वन की आवश्यकता बहुत गहराई तक व्याप्त है। वह इनसे दूर रहकर स्थाई आन्तरिक तृप्ति नही प्राप्त कर सकता। शायद यही कारण है कि महानगरों में रहने वाले लोगों को वनों के दर्शन, संस्पर्शन व परिक्रमण में असीम सुख की प्राप्ति होती है।
पुराणों के अनुसार वृक्षों की सेवा से सम्पूर्ण सृष्टि की सेवा करने का पुण्य कार्य सम्पन्न होता है। वृक्षों की सेवा में जल से सिंचन का स्थान सर्वोपरि है। पर्याप्त जल पाने से वृक्ष की जीवन की रक्षा होती है, ये तेजी से बढ़ते हैं, इन पर आश्रित प्राणियों को सुख मिलता है व पर्यावरण सुधरता है।
स्कन्द पुराण में, भविष्योत्तर पुराण में तथा अन्य पुराणों में भी तुलसी, पीपल तथा बेल इत्यादि वृक्षों इत्यादि वृक्षों में धार्मिक माहात्म्य के द्वारा जल सिंचन का प्रावधान है जो हमारी धार्मिक-मान्यताओं में आज भी प्रचलित है।
मानवी चेतना पर शोध करने वाले ऋषियों, विद्वानों का मानना है कि तरूसेवा में व्यक्ति जो श्रम और पुरूषार्थ व्यय करता है उससे उसका पाप क्षीण होता है, पुण्य बल बढ़ता है व इसके प्रभाववश सभी प्रकार के दुखःदुर्भाग्य दूर होते हैं व सुख-सौभाग्य का अभ्युदय होता है। यह अर्जन बिना श्रम के नहीं बल्कि तपस्या के बदले होता है। जल सिञ्चन के बहाने पवित्र वृक्षों का सान्निघ्य हमें सद्विचार व उस पर चलने की शक्ति देता है और व्यक्तित्व का परिष्कार करता है।
सेचनादपि वृक्षस्य रोपितस्य परेण तु।
महत्फलमवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा।। – विष्णुत्तर पुराण 3.297
अर्थात् दूसरे द्वारा रोपित वृक्ष का सिंचन करने से भी महान् फलों की प्राप्ति होती है, इसमें विचार करने की आवश्यकता नही है।
पुराणों में पर्यावरण सेवा के माध्यम से आत्म कल्याण करने की अदभुत विद्या ऋषियों ने विकसित की है, कब किस वृक्षों को किस पकार सिंचन किया जाय, उन्हें कहां लगाया जाए, जिससे व्यक्ति का अधिकतम कल्याण हो, इसके लिए अनेक व्रत बनाये गये जिसमें कुछ व्रत आजकल भी प्रचलन में है, किन्तु वे मूल उद्देश्य से भटक गये हैं जिसका श्रेय हमारे आधुनिक तथाकथित वैज्ञानिकों पर जाता है जो इसे अध्यात्मक और धर्म का अन्धविश्वास तक कह जाने में हिचकिचाते नही हैं।
पर्यावरण और अध्यात्म दोनों का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। ऋषिगणों के समय में यह सम्बन्ध अविच्छिन्न बना रहा इसी कारण कभी भी दैवी आपदाएं प्राकृतिक विभीषिकाओं की बहुलता नही रही।
हमारे ऋषिगण विश्वराष्ट्र की बात कहते थे एवं उसे पुष्ट बनाने का निर्देश देते थे। ‘‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः’’(अथर्ववेद 12.1.12) के रूप में एक अतिमहत्वपूर्ण सूत्र हमें ऋषियों ने दिया । आज चारों ओर वृक्षों का विनाश हो रहा है, इसी कारण सभी प्रकार की विपत्तियां हम पर बरस रही है। भूमि का कटाव उपजाऊ मिट्टी का क्षरण होकर उसका समुद्र में बहकर चले जाना एवं क्रमशः कवच हटते चले जाने से पृथ्वी का तापमान बढ़ना इसी कारण से हो रहा है।
वृक्षों से संसार के पर्यावरण का कितना बड़ा कल्याण होता है इसका सही अनुमान सामान्य जन नहीं कर पाते। भारतीय ऋषियों ने धर्मग्रन्थों में वृक्षों को संतान से भी अधिक महत्व दिया है। अपना कल्याण करने के लिए वृ़क्ष को संतान से भी अधिक महत्व दिया है। अपना कल्याण करने के लिए वृक्ष को पुत्र रूप में ग्रहण करने का विधान निर्धारण करना ऋषियों की इसी सोच का एक अंग है। इस विषय में मत्स्य पुराण स्पष्ट कहता है-
दशकूप समोवापी दशवापीसमोहृदः।
दशहृदसमः पुत्रो दशपुत्रसमः द्रुमः।। – विधान पारिजात खण्ड 4. अ0 49.
अर्थात् एक सरोवर के निर्माण में जो पुण्य होता है वह दस कुओं के निर्माण के समान है और दस सरावरों के निर्माण में जो पुण्य होता है वह एक हृद (विशाल सरोवर) के निर्माण में है। दस विशाल सरोवरों को एक पुत्र के समान माना गया है। और एक वृक्ष का रोपण दस पुत्र के समान कहा गया है।
पुराणकार ने पर्यावरण संरक्षण तथा उससे होने वाले हानि लाभ का विविध-पुराणों में स्पष्ट विधान बताया है। उन्होंने तो प्रसन्न होकर वृक्षों को ‘‘तरू’’ की संज्ञा तक दे डाली अर्थात् तारने- वाला । पुराण के अनुसार सामान्य रूप में तरू को वृक्षों के पर्यायवाची के रूप में मानते हैं किन्तु तरू का शाब्दिक अर्थ है तारने वाला। वृक्ष अपने रोपणकर्ता को नरक से तारते हैं, रक्षा करते है इसलिए उन्हे तरू कहा जाता है। तरू शब्द की व्याख्या ‘‘वाचस्पत्यम्’’ में इस प्रकार है-
तरन्त्यनेन नरकमारोपकाः इति तरूः (पु0)
तृ- उन् (रोपणकर्ता को नरक से तारते हैं)।
‘‘अमरकोश’’ की रामाश्रमी टीका में तरू की व्याख्या इस प्रकार है- तरूः तरति। तरन्त्यनेन इति वर तृ प्लवनसंतरणयोः’।
‘‘शब्दकलपद्रुम’’ में तरू की व्याख्या इस प्रकार है-
तरूः- तरति समुदृादिकमनेनेति।
समुद्र आदि नरक कुण्डों से पार करते हैं।
तृ$ ‘‘भृमृशीतृचरीति’’
अग्निपुराण कहता हैः-
सतपुत्रेण मुनिश्रेष्ठाः समुत्पन्नेन दुम्र्मतिः।
उत्ततारान्वियात् स्वर्गे पुन्नामनरकाद्द्रुतम्।।
हे मुनिश्रेष्ठ। बुरे व्यक्ति के भी सत्पुत्र उत्पन्न हो जाने से उसे पुत् नरक से रक्षा व स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
श्रीमद्भागवत् महापुराण दशमस्कन्ध के बीसवें अध्याय के 32.33.34वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने ग्वालबालों को सम्बोधित करते हुए कहाः-
पश्येतान् महाभागान् परार्थेकान्तजीवितान्।
वातवर्षातपहिमान् सहन्तो वारयन्तिनः।।
अहो एषां वरं जन्म सर्वप्राण्युपजीवनम्।
सुजनस्येव येषां वै विमुखा यान्ति नार्थिनः।।
पत्र पुष्पफलच्छायामूल वल्कलदारूभिः।
गन्धनिर्यासभस्मास्थितोक्मैः कामान् वितन्वते।।
मेरे प्यारे मित्रों। ये वृक्ष कितने भाग्यवान् है। इनका सारा जीवन केवल दूसरों की भलाई करने के लिए ही है। ये स्वयं तो हवा के झौंके, वर्षा, धूप और पाला सब कुछ सहते हैं परन्तु हम लोगों की उनसे रक्षा करते हैं। मैं कहता हूं कि इन्ही का जीवन सबसे श्रेष्ठ है। क्योंकि इसके द्वारा सब प्राणियों को सहारा मिलता है। उनका जीवन निर्वाह होता है जैसे किसी सज्जन पुरूष के घर से कोई याचक खाली हाथ नही लौटता वैसे ही इन वृक्षों से भी सभी को कुछ न कुछ मिल ही जाता है। ये अपने पत्ते, फूल, फल, छाया, जड़, छाल, लकड़ी, गन्ध, गोंद, राख, कोयला, अंकुर और कोपलों से भी लोगों की कामना पूर्ण करते हैं।
यथाः-
छायामन्यस्य कुर्वन्ति तिष्ठन्ति स्वयमातपे।
फलान्यपि परार्थाय वृक्षाः सत्पुरूषा इव।। – महाभारत
अर्थात् दूसरों की छाया करते हैं, स्वयं धूप में रहते हैं, फल भी स्वयं नही खाते; दूसरों की ही खिलाते हैं; वस्तुतः ये वृक्ष, पेड़, पौधे किसी महान् सत्पुरूष के तरह होते हैं।
पर्यावरण संरक्षण हेतु पुराणों में ऐसे ऐसे सार्वजनिक-पथ का प्रदर्शन है जिससे पर्यावरण के साथ ननु…………. नच…………… का कथमपि अवसर नही होता।
जैसे-
पद्मपुराण में तरूपुत्र की संज्ञाः-
अपुत्रस्य च पुत्रत्वं पादपा इह कुर्वते।
यच्छन्ति रोपकेभ्यस्ते तीर्थे च तर्पणादिकर्म।।
तीर्थे पुत्र सहस्राणामेकमेव करिष्यति। – विधान पारिजात खण्ड 4 अ0 206
पुत्र- सहस्राणामेकमेव करिष्यति।
पुत्र- सहस्राणां कर्तव्यमिति शेषः।।
अर्थात पुत्र के रूप में वृक्ष लगाने वाले पुत्रहीन को वृक्ष सुख प्रदान करते हैं। वृक्षों को तर्पण करने से तीर्थ में तर्पण हो जाता है। हजारों पुत्रों में तीर्थ में एक ही पुत्र तर्पण करेगा और वृक्ष पुत्रों के समान है।
वरं भूमिरूहाः पत्र्च न तु कोष्ठरूहा दश।
पत्रैः पुष्पैः फलैम्र्मूलैः पणिनः प्रीणयन्त्यमी।। – विधान पारिजात खण्ड 4/ अ0 49
पांच वृक्षों का भी रोपण करना दस पुत्र के समान होता है। क्योंकि एक वृक्ष अपने पत्तों से पुष्पों से फलों से जड मूल से जीवों को जीवनदान करते हैं।
छायया चातिथीन्सर्वान्पूजयन्तिमहीरूहाः।
किनरोेरगरक्षासि देवगंधर्वमानवाः।।
तथाऋषि गणाश्चैैव संश्रयंतिमहीरूहान्।
पुष्पिताः फलवंतश्चतर्पयन्तीह मानवान्।।
इहलोके परे चैव पुत्रास्ते धर्मतः स्मृताः।। – पद्मपुराण
नन्दिपुराण में तरूपुत्रः-
तरूपुत्रन्तु यः कुरूर्याद्विधिवद्वह्नि सन्निधौ।
स महापातकैर्युक्तं समुद्धत्य कुलत्रयम्।।
नरकेभ्यो नरो याति प्रजापति पदं शुभम्।। – विधान पारिजात चाण्ड 4 अ0 206
जो व्यक्ति विधिपूर्वक अग्नि का स्थापन करके पुत्र के रूप में वृ़क्ष का रोपण और उत्सर्ग करता है वह सम्पूर्ण महोपातकों से अधोगति में पडे हुए अपने तीन पीढ़ी का उद्धार करता है वह व्यक्ति अपने पितरों के साथ नरक से मुक्त होकर प्रजापति के लोक में अर्थात् पितृलोक में जाता है।
अग्निपुराण के अनुसार-
तस्मात् सुबहवो वृक्षा रोप्याः श्रेयोऽभिवाञ्छता।
पुत्रवत् परिपाल्याश्च ते पुत्रा धम्र्मतः स्मृताः।।
किं धम्र्मविमुखैर्मत्यैः केवलं स्वार्थहेतुभिः।
तरूपुत्राः वराः येतु परार्थैंकानुवृत्तयः।।
अर्थात् उन्नति की इच्छा रखने वाले अनेक वृक्षों को लगायें। उनका पुत्र के समान पालन पोषण करें। धर्म से विमुख वे इस मत्र्यलोक में केवल स्वार्थ के वशीभूत हंै। वृक्ष को पुत्र रूप में जिन्होने वरण किया वे दसरों के लिए अनुकरणीय हैं।
स्कन्दपुराण के कार्तिक माहात्म्य मेंः-
रोपणात्पालनात्सेकाद् दर्शनात्स्पर्शनान्नृणाम्।
तुलसी दहते पापं वाड.मनः कायसञ्चितम्।। – स्कन्द पुराण
अर्थात तुलसी वृक्ष लगाने, पालन करने, सिंचाई करने, दर्शन, स्पर्श से कायिक, वाचिक, मानसिक संचित पाप नष्ट हो जाते हैं।
उपसंहारः- इस प्रकार मत्स्य पुराण, विष्णुस्मृति, ब्रहमवैवर्त-पुराण, अग्निपुराण, वाराहपुराण, भविष्यपुराण, भविष्योत्तर पुराण, स्कन्दपुराण, पद्मपुराण, वामनपुराण, तथा अन्यान्य पुराणों के साथ श्रीमद्भागवद् महापुराण में पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित अन्यान्य मार्गों का धार्मिक निर्देश किया गया है। समाज उसे हजारों वर्षों से करता आ रहा है और करता रहेगा वसरते विज्ञान के विद्यार्थी अपने विशिष्ट ज्ञान का अज्ञान न फैलाये तो। क्योंकि फिर इसका दुष्परिणाम भयंकर हो सकता है।
वे भाग्यशाली है जिन्होंने पेड़-पौधों की रक्षा सेवा व अभिवर्धन में किसी भी प्रकार का योगदान देना पुराणों के अनुसार सबसे बड़ा धर्म है।ै आपको अपने कृत्यों के लिए किसी को सफाई देने की आवश्यकता नही है, ईश्वर आपके अन्दर खुद बैठा है; आपके प्रत्येक कार्य को देख रहा है।
अतः मै आप सबका आह्नान करता हूं कि यदि मनुपुत्रों को बचाना है तो उसका एकमात्र उपाय तरूपुपुत्रों का संरक्षण ही है तभी हम वैभवशाली इतिहास की पुनरावृत्ति कर सकेंगे और स्वच्छ वायु में सुखमय जीवन यापन कर सकेंगे।
संदेश एवं शुभकामनाः-
वृक्षाणां कर्तनं पापं, वृक्षाणां रोपणं हितम्।
सुवृष्टिः जायते वृक्षैः उक्तं विज्ञानवादिभिः।।
स्वस्त्यस्तु विश्वस्य खलः प्रसीदतां
ध्यायन्तु भूतानि शिवं मिथो धिया।
मनश्व भद्रं भजतादधोक्षजे।
आवेश्यतां नो मतिरप्यहैतुकी।। भागवतपुराण 2.18.9.
विश्व का कल्याण हो, दुष्टों की बुद्धि शुद्ध हो, सब प्राणियों में परस्पर सद्भावना हो सभी एक दूसरे का हितचिन्तन करें, हमारा मन शुभ मार्ग में प्रवृत्त हो और हम सबकी बुद्धि निष्कामभाव से भगवान श्री हरि में प्रवेश करें।

  • यह शोध लेख काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण शोध संगोष्ठी में प्रस्तुत किया गया।

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