ढकरानी विलेज से बहुत कुछ सीखकर लौटे हम

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देहरादून से 38 किमी. दूर ढकरानी गांव टाइम के साथ आगे बढ़ रहा है। मैंने ऐसा महसूस किया। स्किल ही नहीं पर्सनालिटी डेवलपमेंट और कान्फिडेंस भी मैंने यहां के युवाओं में देखा। करीब डेढ़ घंटे तक हम गांव में रहे, यहां के स्कूलों में बच्चों से मुुलाकात की। स्किल डेवलपमेंट सेंटर में युवाओं से मिले। गरिमा शर्मा दीदी से भी मिले, जो युवाओं को कंप्यूटर की बेसिक नॉलेज के साथ इंगलिश स्पीकिंग, पर्सनालिटी डेवलपमेंट में सहयोग कर रही हैं। गरिमा सहारनपुर जिले के किसी गांव की रहने वाली हैं, उनके चेहरे पर कान्फिडेंस है और बातचीत करने का तरीका हमें काफी पसंद आया। उन्होंने लैंगुएज पर काफी काम किया है, तभी तो जितने अच्छे से हिन्दी बोल रही थीं, उतनी ही शानदार इंगलिश।
मानवभारती उत्तराखंड बिहार कम्युनिटी इंगेजमेंट प्रोग्राम 2019 में हमें ढकरानी का विजिट करना था। मानवभारती स्कूल देहरादून से हमारी बसें चकराता रोड पर चल दीं। हमें बताया गया कि आपको ढकरानी गांव में कम्युनिटी और वहां हो रहे कार्यों के बारे में जानना है। हम काफी उत्साह में थे, क्योंकि हमें कम्युनिटी और स्पेशियली वहां के बच्चों से बात करने का मौका जो मिला था। यह गांव देहरादून चंडीगढ़ रूट पर विकासनगर से 6 किमी. दूरी पर है। विकासनगर होते हुए चकराता भी जाते हैं।
ढकरानी गांव में सबसे पहले हम राजकीय माध्यमिक विद्यालय, ढकरानी पहुंचे। इस विद्यालय में मैक्स इंडिया फाउंडेशन ने लैब तैयार की है, जो बहुत शानदार है। बच्चों ने यहां साइंस के नियमों को बताने वाले खिलौनों का आनंद लिया और कुछ जानने की कोशिश की। मानवभारती स्कूल देहरादून का अचिंत्य तो कह रहा था, बड़ा मजा आया। हमने प्रिंसिपल सुरेंद्र दत्त सर और लैब इंचार्ज साइंस टीचर राकेश सर से भी मुलाकात की। राकेश सर ने बताया कि साइंस का कोई भी रूल समझाना हो तो बच्चों को लैब लेकर आते हैं। खिलौनों से खेल खेल में समझाने में काफी मदद मिलती है। वाकई कमाल की है यह लैब।
लैब से बाहर आते ही हम पहुंचे राजकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय में। यह स्कूल क्लास 6 से 8 तक है और यहां करीब 300 बच्चे पढ़ते हैं। हमने प्रिंसिपल नरेंद्र प्रकाश सर से परमिशन ली और क्लास 8 में गए। हमारे चीफ मेंटर राजेश्वर सर भी हमारे साथ थे। उस समय क्लास में कुशलमणि सर पढ़ा रहे थे। सब बच्चे डिसिप्लिन में पढ़ाई कर रहे थे। क्लास में पहुंचने पर बच्चों ने खड़े होकर हमारा वेलकम किया।
 
हमने उनसे कहा, हम आपसे मिलने आए हैं। आपके बारे में जानने आए हैं। मानवभारती स्कूल देहरादून की अवंतिका ने आसमीन से पूछा, आपकी हॉबी क्या है। आसमीन ने कहा, मुझे पढ़ना अच्छा लगता है। मैं चाहती हूं कि हमेशा पढ़ती रहूं। सनां ने सभी को एक दोहा सुनाया, माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर, कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर। सनां ने इस दोहे का अर्थ भी समझाया। हम सबने आसमीन और सनां के लिए तालियां बजाईं।
मानव भारती स्कूल पटना के अक्षत ने हवाओं में बहेंगे, घटाओं में रहेंगे….गाना सुनाया, जिसको पसंद करते हुए बच्चों ने तालियों से उसका स्वागत किया। ढकरानी स्कूल के साकिब ने आज का विचार सुनाया, सदा सत्य बोलो। हम एक और क्लास में गए, जहां बच्चों ने हमारे बारे में पूछा कि हम कहां से आए हैं। हम यहां क्यों आए हैं। हमारा गांव आपको कैसा लगा। हमारे और आपके स्कूल में क्या अंतर है। हमारे टीचर बहुत अच्छे हैं और आपके टीचर कैसे हैं।
हमने कहा, हमारे टीचर भी बहुत अच्छे हैं और हमें इतनी दूर आपसे मिलवाने के लिए लाए हैं। हमने आपके गांव और स्कूल के बारे में जाना तो बहुत अच्छा लगा। हमें तब और ज्यादा अच्छा लगा, जब बच्चों ने क्लास से बाहर आकर हमें बॉय बॉय किया। वो काफी खुश दिख रहे थे और हम भी काफी खुश थे। हमें बच्चों से मिलने की परमिशन देने के लिए प्रिंसिपल नरेंद्र प्रकाश सर और आनंद सिंह सर को बहुत बहुत थैंक्यू।
स्कूल से हम मैक्स इंडिया फाउंडेशन के जीवन कौशल केंद्र में गए, जिसके परिसर में बायो डायजेस्टर टैंक रखा था। मैक्स फाउंडेशन के अधिकारी विशाल सर ने हमें बताया कि यह डायजेस्टर घरों से निकलने वाले बायो वेस्ट को पानी में बदल देगा। इस पानी को साफ सफाई, गार्डन, वेजीटेबल फार्मिंग में यूज किया जा सकता है। डेली 15 पर्सन के यूज के लिए इसको डिजाइन किया गया है। इसमें बैक्टीरिया डाला जाता है, जो मल्टीप्लाई होता रहता है।
यह बैक्टीरिया ही सॉलिड वेस्ट को पानी में बदलता है। यह भी ध्यान रखना होगा, अगर इसको 1 महीना यूज नहीं किया तो बैक्टीरिया खत्म हो जाता है। इसको लगाने का मतलब यह है कि घर पर ही सीवरेज का ट्रीटमेंट हो सकता है। ढकरानी विलेज के 500 घरों में इसको लगाना है, अभी तक 200 लगा चुके हैं। हमें यह भी बताया कि एनएयरोबिक बैक्टीरिया, जिसको ग्रोथ के लिए आक्सीजन की जरूरत नहीं होती, बायोटॉयलेट में यूज किया जाता है। यह फैक्ट हमें पहली बार पता चला। हमारी टीचर ने हमें काफी अच्छे से इसके बारे में समझाया।
हम कौशल केंद्र ( स्किल सेंटर) में गए, जहां गरिमा दीदी और कुछ यूथ हमारा इंतजार कर रहे थे। उन्होंने हमें अपना इंट्रोडक्शन दिया। इनमें से कुछ यूथ ने स्कूल छोड़ दिया है और किसी स्किल के साथ एंप्लायमेंट चाहते हैं। गरिमा दीदी ने बताया कि ऐसा देखने मे ंआया है कि बच्चे 10 या 12 के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं, लेकिन इनके लिए लाइफ में कुछ करने के ऑप्शन हमेशा रहते हैं। हर बच्चे का अपना ड्रीम है, जिसे वो पूरा करना चाहता है। यहां 6 महीने का स्किल डेवलमेंट कोर्स करने के बाद एंप्लायमेंट मिल जाता है या फिर सेल्फ एंप्लायमेंट कर सकते हैं।
यहां हमें अंकित मिले, जो हरबर्टपुर में रहते हैं। वह फुटबालर बनना चाहते हैं। उन्होंने 10 पास किया है और सेंटर में अपने इंगलिश कम्युनिकेशन स्किल को बढ़ा रहे हैं। कंप्यूटर की बेसिक नॉलेज ले रहे हैं। अस्मां ढकरानी की रहने वाली हैं। 12 पास किया है और इंगलिश कम्युनिकेशन स्किल को बढ़ाना चाहती हैं। अस्मां ने अपना इंट्रोक्शन इंगलिश में दिया। उन्हीं की तरह शाइमा, आशिया, ओसामा भी इंगलिश स्पीकिंग की ट्रेनिंग ले रहे हैं। प्रेम सिंह जो एमए सोसियोलॉजी हैं, जॉब के एग्जाम की तैयारी कर रहे हैं, कहते हैं कि यहां पर्सनालिटी डेवलेपमेंट, कंप्यूटर की बेसिक नॉलेज के कोर्स भी कराए जाते हैं। गरिमा ने हमें सिखाने के लिए बेंग्लुरू में ट्रेनिंग ली है।
50 बच्चों और टीचर को अपना इंट्रोडक्शन देते समय इन सभी के चेहरे पर कान्फिडेंस देखकर मुझे लगा कि मन लगाकर सीखने से लाइफ में कितना बड़ा चेंज हो सकता है। मैंने महसूस किया कि हर गांव को ऐसे सेंटर्स की जरूरत है, क्योंकि ये पर्सनालिटी और कान्फिडेंस को बढ़ाते हैं। ढकरानी गांव में कुछ समय बिताने के बाद हम वापस लौट आए देहरादून की ओर। हमने काफी कुछ सीखा और जाना। थैंक्यू मानवभारती, आपने हमें उत्तराखंड के एक ऐसे गांव का विजिट कराया, जो सबको इंस्पायर कर रहा है।

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