दसवीं का रिजल्ट और अतीत की बातें

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नवंबर 2014 में मानवभारती स्कूल के बच्चों ने देहरादून के कशीगा स्कूूल में आयोजित अंतर्विद्यालय संस्कृत प्रतियोगिता की ट्राफी जीती थी, इनमें से कई बच्चे दसवी के टॉपर हैं। (फाइल फोटो)
  • डॉ. अनंतमणि त्रिवेदी
डॉ. अनंतमणि त्रिवेदी

सीबीएसई दसवीं में मानवभारती स्कूल के टॉपर्स की लिस्ट देखते ही मैं अतीत में चला गया। वक्त था नवंबर 2014 का, जब मानव भारती स्कूल के छात्र-छात्राएं देहरादून स्थित कशीगा स्कूल में आयोजित अंतर्विद्यालय गीता प्रतियोगिता की ट्राफी जीतकर लाए थे। इन बच्चों ने श्रीमद्भगवद् गीता के श्लोकों का बेहतर तरीके से शुद्ध उच्चारण ही  नहीं किया था, बल्कि श्लोकों के महत्व पर भी अपनी बात रखी थी। जब ये बच्चे स्कूल पहुंचे तो उनको निदेशक डॉ. हिमांशु शेखर और प्रिंसिपल सर ने उनको सम्मानित किया था। सम्मानित होने वाले ये आज दसवीं के टॉपर भी हैं। इनमें कुशाग्र कुकरेती ने 93.2, श्रेया मधवाल ने 92.8 और शालू यादव ने 91.2 फीसदी अंक हासिल किए हैं।

2014 के उस फोटो और दसवीं के रिजल्ट में एक समानता जो मुझे दिखती है, वो है भाषा की ताकत। भाषा चाहे संस्कृत हो या हिन्दी या अंग्रेजी… वो व्यक्ति का ज्ञान बढ़ाने के साथ उसके व्यक्तित्व को भी बेहतर बनाने में सहयोगी होती है। कुशाग्र, श्रेया और शालू, अंशिका ही नहीं उस फोटो में दिखाई दे रहे सभी बच्चे पढ़ाई में बेहतर कर रहे हैं। ये अनुशासित और लगन के साथ अपने कार्यों को पूरा करने वाले छात्र-छात्राएं हैं। ये छात्र-छात्राएं मानवभारती स्कूल परिसर में हर रविवार को गीता स्वाध्याय केंद्रम् में भी अनवरत रूप से उपस्थिति दर्ज कराते रहे हैं। ऐसा वो किसी दबाव में नहीं कर रहे हैं, मुझे लगता है ये बच्चे भाषा को तरजीह देते हैं। गीता स्वाध्याय केंद्रम् के संचालन का उद्देश्य बच्चों में नैतिकता के साथ राष्ट्र, समाज और परिवार के प्रति कर्तव्य का भाव जगाना है।
अभी तक जो मैं समझ रहा हूं कि बेहतर प्रदर्शन में श्रीमद्भगवद् गीता और भाषा का भी अहम योगदान है। छात्र जीवन में पढ़ाई के साथ लगन, अनुशासन और अपनी जिम्मेदारियों को समझने का भाव होना अत्यंत जरूरी है। एक विशेष बात जो मैंने महसूस की है कि अगर छात्र किसी भाषा को पढ़ना, उसमें बेहतर तरीके से लिखने और विषय को समझने पर ध्यान लगाएं तो सफलता दूर नहीं रहती।

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