सच कहा था टीचर ने, ये किताबें तो बोलती हैं

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हमने अपनी टीचर से सुना है कि पुस्तकें हमारी अच्छी मित्र होती हैं। पुस्तकों में ज्ञान का भंडार है। अगर वो हमारी मित्र होती हैं तो हमसे बातें क्यों नहीं करती। हमें तो अपनी स्कूल की किताबों से ही इतनी फुर्सत नहीं होती कि दूसरी किताबों को कहां से पढ़ें। हम सोचते कि कोर्स से बाहर की किताबें हमारे कुछ काम की नहीं। छुट्टियों में मजेदार कॉमिक्स जरूर पढ़ते हैं। अब तो वीडियो गेम, कार्टून शो ही खूब दिखते हैं। कल हमारी टीचर ने बताया कि आपको एजुकेशनल टूर पर जाना है। इस बार आपको ले जाते हैं कि देहरादून के परे़ड ग्राउंड, जहां नेशनल बुक ट्रस्ट ने बुक फेयर लगाया है।

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कैसा होगा बुक फेयर, कौन सी किताबें होंगी वहां, क्या वहां वो किताबें भी मिलेंगी, जो बातें करती हैं। हमारी ऐसी कौन सी जरूरतें हैं, जो किताबों की मदद से पूरी हो जाएंगी। यही कुछ सोचते हुए हम सोमवार सुबह तैयार होकर स्कूल पहुंच गए। यहां टीचर ने हमारी अटेंडेंस लेकर सभी को बसों में बैठाया। हमें अनुशासित रहकर बुक फेयर के स्टालों पर किताबों के बारे में जानकारी लेने, पसंद की किताबों की लिस्ट बनाने और बुक फेयर के बारे में डायरी लिखने को कहा। अलग-अलग बच्चों के डायरियों के कुछ अंश।

स्कूल में चार बसें तैयार मिलीं। क्लास 7 और 8 के आदर्श, श्लोक, सौभाग्य, हर्षित, मनीषा, लहर व सृष्टि सहित 114 छात्र-छात्राएं टीचर्स के साथ परेड ग्राउंड पहुंच गए। हमारे साथ टीचर डॉ. बबीता गुप्ता, सोनिया, अनुराधा, विदुषी, रूपल और अनिल सर थे। बुक फेयर में बने अलग-अलग स्टालों में बहुत सारी किताबें हमारा इंतजार कर रही थीं। मानो वो हम सभी से कह रही थीं कि आओ, हमें देखो और पढ़ो- हमारे पास तुम्हारे सभी सवालों के जवाब हैं। हम जीना सिखाती हैं और जीने की राह दिखाती हैं। हम ज्ञान का भंडार हैं, हम महापुरुषों के जीने का सार हैं और हमारे पास है- वो ताकत, जो आपको तरक्की के लिए प्रेरित करती है। दुनिया बनने से लेकर आज तक के तमाम किस्सों और कहानियों का संकलन हैं हम। हम महज कागज से बनी आकृति ही नहीं बल्कि वो सागर हैं, जिनमें ज्ञान की एक-एक बूंद को बड़े सहज और सरल संवाद में भरा गया है। हम आपको हंसाती हैं और मुद्दों को लेकर गंभीर भी बनाती हैं। हम परंपरा हैं, संस्कृति हैं, साहित्य हैं, विज्ञान हैं, तकनीकी हैं, किस्से हैं, कहानियां हैं, गीत हैं, संगीत हैं, धर्म हैं, कला हैं, अध्यात्म हैं, योग हैं….हमारी गाथा अंतहीन है। हम मानवता से संवाद करातीं कथाएं हैं।

यह कौन सी दुनिया में आ गए हम। किताबें तो वाकई बातें करती हैं, टीचर ने सही कहा था। बुक फेयर में नमामि गंगे परियोजना की किताबें मिलीं। यहां कुछ किताबें प्रकृति की सुरक्षा का पाठ पढ़ाती मिलीं। पर्यावरण- धरती, नदियों और वायुमंडल को स्वच्छ बनाने के तरीके बता रहीं हैं ये बुक्स। कार्टून, ड्राइंग, कंप्यूटर, ग्राफिक डिजाइन, राजनीति, नैतिक शिक्षा सहित कई विषयों की किताबें हैं यहां, एक से बढ़कर एक।

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डिक्शनरी, इनसाइक्लोपीडिया यानि विश्वकोष, जिसमें शब्दों का संसार बसा है। सवाल उठता है कि दुनिया में इतने शब्द आए कहां से। इन शब्दों का जन्म कैसे हुआ। एक-एक शब्द कैसे आया। हमने कुछ किताबों की लिस्ट स्कूल आकर अपनी टीचर को सौंप दी। वहां हमने नशा मुक्ति पर एक नाटक भी देखा। सच मानो तो हमारा मन कर रहा था कि शाम तक यहीं किताबों को देखते रहें, स्टालों पर जाकर उनके बारे में जानकारियां लेते रहे। स्टाल पर उपस्थित कर्मचारियों से हमने कुछ किताबों के बारे में जानकारी ली। सभी बच्चों को किताबों की दुनिया का भ्रमण कराने के लिए थैंक्यू टीचर।

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